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दिव्या मित्तल की राजनीति में दस्तक, IAS छोड़ने के फैसले से जनसेवा पर नई बहस


लखनऊ पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल के चुनावी राजनीति में उतरने के फैसले ने सार्वजनिक जीवन में प्रशासनिक सेवा और राजनीति की भूमिका को लेकर बहस छेड़ दी है। प्रशासनिक सेवा से अलग होकर राजनीति के माध्यम से लोगों के बीच काम करने की इच्छा जताने वाली दिव्या मित्तल का तर्क है कि प्रशासनिक सेवा में रहते हुए उन्होंने ऐसी अनेक समस्याओं को करीब से देखा जिनके स्थायी समाधान के लिए नीतिगत और राजनीतिक स्तर पर बदलाव जरूरी हैं।उनका यह दृष्टिकोण इस सवाल को भी सामने लाता है कि क्या व्यवस्था में बड़े बदलाव के लिए राजनीति में आना जरूरी है या प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी जनहित के लिए प्रभावी काम किया जा सकता है।प्रशासनिक सेवा को केवल सरकारी फाइलों और योजनाओं के क्रियान्वयन तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा। एक IAS अधिकारी जिला प्रशासन से लेकर राज्य और केंद्र सरकार के विभिन्न स्तरों पर शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल, कानून-व्यवस्था, सामाजिक कल्याण और विकास योजनाओं जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम करता है।IAS अधिकारी के पास कानून बनाने का अधिकार नहीं होता, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था में उसे कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां और अधिकार प्राप्त होते हैं। इनका प्रभावी इस्तेमाल करके सरकारी योजनाओं को जमीन पर बेहतर तरीके से लागू किया जा सकता है और आम नागरिकों से जुड़ी समस्याओं के समाधान की दिशा में काम किया जा सकता है।स्कूलों की स्थिति सुधारने, अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ाने, सड़क और पेयजल जैसी समस्याओं के समाधान, सरकारी योजनाओं को पात्र लोगों तक पहुंचाने और शिकायतों के निस्तारण जैसे क्षेत्रों में प्रशासनिक अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।अगर किसी अधिकारी को लगता है कि किसी क्षेत्र में सरकारी व्यवस्था प्रभावी तरीके से काम नहीं कर रही है, तो उसके पास प्रशासनिक जिम्मेदारियों के दायरे में रहते हुए सुधार की कोशिश करने का विकल्प भी होता है। हालांकि प्रशासनिक अधिकारियों के अधिकारों की अपनी सीमाएं हैं और कई बड़े नीतिगत फैसले राजनीतिक एवं विधायी प्रक्रिया से जुड़े होते हैं।यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक सेवा और राजनीतिक भूमिका में अंतर दिखाई देता है। प्रशासनिक अधिकारी मौजूदा कानूनों और सरकार की नीतियों के अनुरूप उन्हें लागू कराने और प्रशासनिक निर्णय लेने की जिम्मेदारी निभाता है। वहीं निर्वाचित जनप्रतिनिधि जनता से मिले जनादेश के आधार पर कानून निर्माण, नीतियों की दिशा तय करने और शासन की प्राथमिकताओं को निर्धारित करने वाली राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है।भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण रहे हैं, जब प्रशासनिक या अन्य सरकारी सेवाओं से जुड़े लोगों ने नौकरी छोड़कर सक्रिय राजनीति का रास्ता चुना। पूर्व आईआरएस अधिकारी राजेश्वर सिंह के अलावा अश्विनी वैष्णव और अर्जुन राम मेघवाल जैसे पूर्व नौकरशाह भी बाद में सक्रिय राजनीति में आए और सार्वजनिक जीवन में अलग भूमिका निभाई।इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक अनुभव रखने वाले लोगों के लिए राजनीति में प्रवेश कोई नई घटना नहीं है। प्रशासनिक अनुभव को राजनीतिक भूमिका में इस्तेमाल करने की संभावना को लेकर भी समय-समय पर चर्चा होती रही है।जनसेवा को किसी एक पद या पेशे से जोड़कर देखना संभव नहीं है। आईएएस की कुर्सी अपने आप में जनसेवा की गारंटी नहीं है और चुनाव लड़ना भी अपने आप में जनसेवा का प्रमाण नहीं है। प्रशासन और राजनीति सार्वजनिक जीवन के दो अलग-अलग क्षेत्र हैं, जिनकी जिम्मेदारियां और कार्यप्रणाली अलग हैं।एक प्रशासनिक अधिकारी व्यवस्था के भीतर रहकर कानून, नियमों और सरकारी नीतियों के अनुसार काम करता है, जबकि निर्वाचित जनप्रतिनिधि जनता से मिले राजनीतिक जनादेश के आधार पर नीति निर्माण और कानून बनाने की प्रक्रिया में भाग लेता है।इस लिहाज से प्रशासनिक सेवा छोड़कर राजनीति में आना जनसेवा का कोई अगला या ऊंचा पड़ाव नहीं माना जा सकता। इसे जनता के हित में काम करने के एक अलग माध्यम के रूप में देखा जा सकता है।दिव्या मित्तल के सामने अब चुनौती प्रशासनिक सेवा में हासिल अनुभव को राजनीतिक भूमिका में प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने की होगी। चुनावी राजनीति में आने के बाद जनता के सामने उनके लिए अपनी नीतिगत प्राथमिकताओं, विकास संबंधी दृष्टिकोण और प्रस्तावित कार्यक्रमों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा।आखिरकार, नौकरी छोड़कर चुनावी राजनीति में उतरना हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन जनसेवा का रास्ता केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। प्रशासनिक सेवा, सामाजिक क्षेत्र, जनप्रतिनिधित्व और अन्य सार्वजनिक भूमिकाएं भी लोगों के हित में काम करने के अलग-अलग माध्यम हैं।

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