मृत व्यक्ति के नाम आयकर नोटिस जारी करना अवैध, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द की पूरी कार्रवाई
लखनऊ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने आयकर विभाग की गंभीर लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी करते हुए मृत व्यक्ति के नाम जारी आयकर नोटिस, पुनर्मूल्यांकन (री-असेसमेंट) आदेश और टैक्स की मांग को पूरी तरह निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी मृत व्यक्ति के नाम पर आयकर अधिनियम की धारा 148 के तहत नोटिस जारी करना कानूनन अमान्य है और ऐसी गलती को बाद में कानूनी उत्तराधिकारी को पक्षकार बनाकर या तकनीकी त्रुटि बताकर सही नहीं किया जा सकता।हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 148 के तहत जारी वैध नोटिस ही पुनर्मूल्यांकन की पूरी प्रक्रिया का आधार होता है। यदि नोटिस ही मृत व्यक्ति के नाम जारी किया गया है, तो उसके आधार पर की गई पूरी कार्यवाही शुरू से ही अवैध मानी जाएगी और उसका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं रहेगा।यह मामला आशा दुबे द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। उनके पति संजय दुबे का जनवरी 2024 में निधन हो गया था। इसके बावजूद आयकर विभाग ने मार्च 2025 में उनके नाम पर आयकर अधिनियम की धारा 148 के तहत नोटिस जारी कर दिया।विभाग का दावा था कि ओमैक्स ग्रुप पर हुई तलाशी के दौरान 27.44 लाख रुपये के कथित नकद लेनदेन की जानकारी सामने आई थी। आरोप लगाया गया कि फ्लैट खरीदते समय संजय दुबे ने संपत्ति की कीमत का एक हिस्सा नकद भुगतान किया था।बाद में आयकर विभाग ने आशा दुबे को कानूनी उत्तराधिकारी मानते हुए लगभग 39.67 लाख रुपये की कर देनदारी निर्धारित कर दी। इसके खिलाफ आशा दुबे ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि जब संबंधित व्यक्ति का नोटिस जारी होने से पहले ही निधन हो चुका था, तब उसके नाम पर नोटिस जारी करना अधिकार क्षेत्र से जुड़ी गंभीर कानूनी त्रुटि है। इसे आयकर अधिनियम की धारा 292B के तहत केवल तकनीकी गलती मानकर वैध नहीं ठहराया जा सकता।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी कानूनी उत्तराधिकारी के खिलाफ कार्यवाही तभी जारी रह सकती है, जब मूल करदाता के जीवित रहते कानून के अनुसार वैध रूप से कार्यवाही शुरू की गई हो। यदि शुरुआत ही अवैध है तो पूरी प्रक्रिया स्वतः निरस्त मानी जाएगी।हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि ऐसे मामलों में भविष्य में उत्पन्न होने वाली कानूनी जटिलताओं को दूर करने के लिए संसद को आवश्यक विधायी संशोधन पर विचार करना चाहिए। साथ ही अदालत ने अपने आदेश की प्रति भारत सरकार के वित्त मंत्रालय को भेजने का भी निर्देश दिया।इस फैसले को आयकर मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे स्पष्ट संदेश गया है कि विभागीय लापरवाही के कारण किसी मृत व्यक्ति के नाम पर शुरू की गई कर कार्यवाही को कानून का संरक्षण नहीं मिल सकता।

कोई टिप्पणी नहीं