सहाबा-ए-किराम हक़ और हिदायत का पैमाना, उनका सम्मान हर मुसलमान पर ज़रूरी: मौलाना आसिफ आज़मी
सुल्तानपुर जामिया इस्लामिया में जारी दस दिवसीय "जलसा शुहदा-ए-इस्लाम" के पांचवें इजलास का आयोजन जामिया के नाज़िम-ए-आला मौलाना मुहम्मद उस्मान कासमी की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। इजलास में मुख्य अतिथि एवं वक्ता मौलाना मुहम्मद आसिफ आज़मी ने सहाबा-ए-किराम की अज़मत, उनके मक़ाम व मर्तबे तथा खिलाफत-ए-राशिदा के विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला।
अपने संबोधन में मौलाना आसिफ आज़मी ने कहा कि नबी-ए-करीम ﷺ के बाद मक़ाम और मर्तबे के लिहाज से हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.), हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.), हज़रत उस्मान ग़नी (रज़ि.) और हज़रत अली अल-मुर्तज़ा (रज़ि.) का दर्जा क्रमवार सबसे ऊँचा है। उन्होंने कहा कि खुलफ़ा-ए-राशिदीन की वर्तमान तरतीब ही तरतीब-ए-बरहक़ है और यही अहल-ए-सुन्नत वल-जमाअत का सर्वमान्य दृष्टिकोण रहा है।मौलाना ने कहा कि सहाबा-ए-किराम इस्लाम में हक़ और मार्गदर्शन का पैमाना हैं तथा उनके सम्मान, तक़द्दुस और अज़मत की हिफाज़त करना हर मुसलमान की जिम्मेदारी है। उन्होंने वाक़िया-ए-ग़दीर-ए-ख़ुम का उल्लेख करते हुए कहा कि उसकी पृष्ठभूमि और संदर्भ अलग था तथा उसे खिलाफत के मसले से जोड़कर देखना उचित नहीं है।इजलास को संबोधित करते हुए मौलाना मुहम्मद मुख़्तार कासमी ने भी सहाबा-ए-किराम की अज़मत, उनके त्याग, बलिदान और दीन-ए-इस्लाम की ख़िदमत में निभाई गई ऐतिहासिक भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सहाबा-ए-किराम की ज़िंदगी उम्मत के लिए आदर्श और प्रेरणा का स्रोत है।कार्यक्रम का शुभारंभ जामिया के छात्र मुहम्मद ज़ाहिद की तिलावत-ए-कुरआन से हुआ। इसके बाद अरबी सोम के छात्र मुहम्मद अजमल ने "सीरत-ए-अली" विषय पर प्रभावशाली तकरीर प्रस्तुत कर उपस्थित लोगों का ध्यान आकर्षित किया। वहीं मौलाना मुहम्मद अराफात कासमी तथा छात्र मुहम्मद सरफराज ने नात व मनकबत पेश कर माहौल को रूहानी रंग में रंग दिया।इस अवसर पर शहर एवं आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में उलेमा, तलबा और आम नागरिक मौजूद रहे। कार्यक्रम का समापन मौलाना मुहम्मद आसिफ आज़मी की दुआ के साथ हुआ। जलसा शुहदा-ए-इस्लाम का यह पांचवां इजलास अत्यंत शांतिपूर्ण, गरिमामय एवं सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।


कोई टिप्पणी नहीं