जलसा शोहदा-ए-इस्लाम 1448 हिजरी के आठवें इजलास में औलाद-ए-नबी और अज़वाज-ए-मुतह्हरात पर हुई तफ़सीली गुफ़्तगू
रिपोर्ट-मो0रिजवान
सुल्तानपुर जामिया इस्लामिया में जारी "जलसा शोहदा-ए-इस्लाम 1448 हिजरी" के आठवें इजलास का आयोजन नमाज़-ए-ईशा के बाद हज़रत मौलाना मोहम्मद उस्मान क़ासमी साहब, नाज़िम जामिया इस्लामिया सुल्तानपुर की सदारत में संपन्न हुआ। इल्मी और रूहानी माहौल में आयोजित इस इजलास में बड़ी संख्या में उलमा, तलबा और अवाम ने शिरकत की।कार्यक्रम का आग़ाज़ मोहम्मद फहद (मुतअल्लिम जामिया इस्लामिया) की तिलावत-ए-कुरआन से हुआ
। इसके बाद नात व मनक़बत के अशआर मोहम्मद अजमल (दर्जा अरबी सोम), मोहम्मद अनस ढीमा (दर्जा अरबी अव्वल) तथा बाद-अज़ाँ मौलाना तारिक़ हाशिम नदवी ने पेश कर महफ़िल को ईमानी जज़्बात से सराबोर कर दिया।इजलास के ख़ुसूसी मुकर्रिर मौलाना मोहम्मद कौसर नदवी साहब ने "औलाद-उन-नबी व अज़वाज-उन-नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम" के विषय पर विस्तार से ख़िताब किया। उन्होंने कहा कि आम तौर पर लोगों के बीच यह धारणा पाई जाती है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की केवल एक ही साहबज़ादी थीं, जबकि ऐतिहासिक और सीरती रिवायतों के अनुसार आपकी चार साहबज़ादियाँ—हज़रत ज़ैनब, हज़रत रुकय्या, हज़रत उम्मे कुलसूम और हज़रत फ़ातिमा ज़हरा रज़ियल्लाहु अन्हुन्ना—थीं। इसी प्रकार आपके तीन साहबज़ादे—हज़रत क़ासिम, हज़रत अब्दुल्लाह (तय्यब व ताहिर) और हज़रत इब्राहीम रज़ियल्लाहु अन्हुम—थे। उन्होंने औलाद-ए-मुबारका की ज़िंदगियों, सीरत, उम्र और उनकी ख़ुसूसियात पर इजमाली मगर अहम रोशनी डाली।अपने बयान के दूसरे हिस्से में मौलाना कौसर नदवी ने अज़वाज-ए-मुतह्हरात का तज़किरा करते हुए बताया कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कुल 11 अज़वाज थीं, जिन्हें उम्महात-उल-मोमिनीन का मुक़द्दस दर्जा हासिल है। उन्होंने तमाम अज़वाज-ए-मुतह्हरात की सीरत, फ़ज़ाइल, दीन की ख़िदमत और उम्मत की तरबियत में उनके अहम किरदार का मुख़्तसर लेकिन जामेअ तआरुफ़ पेश किया।मौलाना ने उन एतराज़ात का भी जवाब दिया जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के निकाहात के संबंध में समय-समय पर उठाए जाते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के निकाह दीनी, शरई, समाजी और सियासी मसालिह के तहत हुए थे, जिनका उद्देश्य इस्लामी समाज की तामीर, उम्मत की रहनुमाई और विभिन्न क़बीलों व समुदायों के बीच बेहतर संबंध स्थापित करना था।उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि मुसलमानों के लिए औलाद-ए-नबी और अज़वाज-ए-मुतह्हरात के बारे में सही और प्रामाणिक जानकारी हासिल करना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि ये सभी अहल-ए-बैत का अहम हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि अहल-ए-बैत का तसव्वुर केवल हज़रत फ़ातिमा ज़हरा रज़ियल्लाहु अन्हा तक महदूद नहीं है, बल्कि इसमें औलाद-ए-नबी और अज़वाज-ए-मुतह्हरात भी शामिल हैं।इजलास का समापन मौलाना मोहम्मद कौसर नदवी साहब की दुआ पर हुआ। अंत में हज़रत मौलाना मोहम्मद उस्मान क़ासमी साहब ने तमाम मेहमानों और शिरकत करने वालों का शुक्रिया अदा करते हुए लोगों से अपील की कि वे जलसे के शेष दोनों इजलासों में भी अपने दोस्तों और अहबाब के साथ बढ़-चढ़कर हिस्सा लें।


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