उम्र के आखिरी पड़ाव में साथी की तलाश, लखनऊ में जुटे 90 बुजुर्ग
उम्र के इस पड़ाव पर जब अधिकांश लोग परिवार के साथ सुकून भरी जिंदगी बिताने की उम्मीद करते हैं।वहीं लखनऊ में आयोजित एक वरिष्ठ नागरिक जीवनसाथी परिचय सम्मेलन ने बुजुर्गों के अकेलेपन की एक अलग तस्वीर सामने रखी। किसी के पास करोड़ों की संपत्ति है तो किसी के पास अपना मकान और नियमित पेंशन, लेकिन जिंदगी में साथ बैठकर दो बातें करने वाला साथी नहीं है। इसी तलाश में 50 से 80 वर्ष की उम्र के 90 बुजुर्ग सम्मेलन में पहुंचे।पारा स्थित एक बरातघर में अनुबंध संस्था की ओर से आयोजित वरिष्ठ नागरिक जीवनसाथी परिचय सम्मेलन में 75 पुरुष और 15 महिलाएं शामिल हुईं। इनमें तलाकशुदा, अविवाहित और अपने जीवनसाथी को खो चुके वरिष्ठ नागरिकों ने एक-दूसरे से मुलाकात की और अपने जीवन के अनुभव साझा किए। सम्मेलन का उद्देश्य बुजुर्गों को उम्र की दूसरी पारी में एक ऐसे साथी की तलाश का अवसर देना था। जिसके साथ वे अपना सुख-दुख साझा कर सकें।मध्य प्रदेश के विदिशा निवासी 84 वर्षीय बुजुर्ग अपने नाती के साथ लखनऊ पहुंचे। उनके पास करोड़ों की संपत्ति और दो मंजिला मकान है, लेकिन कोविड काल में पत्नी के निधन के बाद जिंदगी में अकेलापन बढ़ता गया। पत्नी का साथ छूटने के बाद बेटों ने भी उनसे दूरी बना ली। ऐसे में संपन्न होने के बावजूद उन्हें एक साथी की कमी महसूस होने लगी। इसी जरूरत ने उन्हें उम्र की दूसरी पारी के लिए हमसफर तलाशने के लिए सम्मेलन तक पहुंचाया।दिल्ली से आई 55 वर्षीय महिला करीब 30 वर्षों से अकेली जिंदगी जी रही हैं। पति की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने बच्चों की परवरिश की। बेटे बड़े हुए तो वे भी अलग रहने लगे। अब जिंदगी की ढलती शाम में उन्हें ऐसे साथी की तलाश है। जिसके साथ बैठकर मन की बातें की जा सकें। वह अपनी एक दोस्त के साथ सम्मेलन में पहुंचीं और कई लोगों से मुलाकात की।महिला ने कहा कि जिंदगी में हमेशा किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है जो पास बैठकर आपकी बात सुने। उम्र बढ़ने के साथ यह जरूरत और भी महसूस होती है। उनके मुताबिक, यदि कोई साथ बैठकर दो बातें सुनने और समझने वाला हो तो जिंदगी काफी आसान हो सकती है।उन्नाव निवासी 67 वर्षीय सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी भी जीवनसाथी की तलाश में सम्मेलन में पहुंचे। उन्हें करीब 42 हजार रुपये प्रतिमाह पेंशन मिलती है और लखनऊ में उनका अपना मकान भी है। बेटियों की शादी हो चुकी है, लेकिन परिवार की उपेक्षा और अकेलेपन ने उन्हें भावनात्मक रूप से परेशान किया। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बावजूद उन्हें किसी ऐसे साथी की जरूरत महसूस हुई। जिसके साथ जीवन के अनुभव साझा किए जा सकें।एक महिला ने अपनी जिंदगी का अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने बूढ़े माता-पिता की सेवा में अपना जीवन लगा दिया। पिता ने कुछ संपत्ति उनके नाम की तो भाइयों ने उनसे दूरी बना ली। कुछ महीने पहले वह गंभीर रूप से बीमार पड़ीं, लेकिन उनका हाल पूछने वाला कोई नहीं था। अस्पताल में अकेले रहने के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि जीवन में संपत्ति से ज्यादा जरूरी एक ऐसा इंसान है, जो मुश्किल समय में साथ खड़ा हो।सम्मेलन में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या काफी कम रही। 90 प्रतिभागियों में जहां 75 पुरुष थे, वहीं केवल 15 महिलाएं शामिल हुईं। संस्था पदाधिकारियों का कहना है कि सामाजिक सोच और पारिवारिक बंदिशों के कारण महिलाएं इस उम्र में दोबारा रिश्ता बनाने के फैसले से अक्सर पीछे हट जाती हैं। समाज में उम्रदराज महिलाओं के दोबारा जीवनसाथी चुनने को लेकर अब भी कई तरह की धारणाएं और झिझक मौजूद हैं।संस्था के अध्यक्ष नटूभाई पटेल, सचिव किन्नारी लखानी और अरिहंत राय जैन ने बताया कि लखनऊ में संस्था की ओर से यह पहला वरिष्ठ नागरिक जीवनसाथी परिचय सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में पहुंचे लोगों ने एक-दूसरे से बातचीत कर अपनी पसंद, जीवन के अनुभव और भविष्य की अपेक्षाएं साझा कीं।सम्मेलन ने यह संदेश भी सामने रखा कि उम्र चाहे कितनी भी हो इंसान को अपनापन संवाद और साथ की जरूरत बनी रहती है। आर्थिक संपन्नता अकेलेपन का समाधान नहीं हो सकती। जीवन के अंतिम पड़ाव में किसी हमसफर का साथ कई बुजुर्गों के लिए सबसे बड़ी जरूरत बन जाता है।

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