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यूपी 40 फीसदी पद खाली, विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी दूर करने को बनेगा नया भर्ती बोर्ड


लखनऊ प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था में डॉक्टरों की भारी कमी अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। प्रांतीय चिकित्सा सेवा (पीएमएस) संवर्ग के करीब 40 फीसदी पद खाली हैं। 18,500 स्वीकृत पदों के सापेक्ष लगभग 11 हजार डॉक्टर कार्यरत हैं।जबकि 7,500 पद रिक्त पड़े हैं। इन रिक्तियों को भरने के लिए सरकार एक ओर वैकल्पिक व्यवस्थाओं के तहत डॉक्टरों की भर्ती कर रही है, वहीं विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति में तेजी लाने के लिए नया भर्ती बोर्ड गठित करने की तैयारी भी कर रही है।स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी सबसे अधिक है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और अन्य ग्रामीण स्वास्थ्य संस्थानों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता का अभाव करीब 70 फीसदी तक पहुंच चुका है। हालात को देखते हुए करीब 2,500 विशेषज्ञ चिकित्सकों की भर्ती का प्रस्ताव उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग को भेजा गया है। हालांकि आयोग के माध्यम से भर्ती प्रक्रिया में लगने वाले लंबे समय के कारण सरकार अन्य विकल्पों पर भी काम कर रही है।राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति के लिए रिवर्स बिडिंग व्यवस्था लागू की गई है। इसके तहत पांच लाख रुपये प्रतिमाह तक के मानदेय पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाएं ली जा रही हैं। पिछले वर्ष इस व्यवस्था के तहत करीब 170 विशेषज्ञ चिकित्सकों की भर्ती की गई थी। इन्हें फर्स्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) वाले चयनित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात किया गया है।इसके अलावा जनवरी 2026 में वॉक-इन-इंटरव्यू के माध्यम से 710 डॉक्टरों की संविदा भर्ती के लिए साक्षात्कार आयोजित किए गए। सरकार ने पहले ही डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष से बढ़ाकर 65 वर्ष कर दी है, ताकि अनुभवी चिकित्सकों की सेवाएं अधिक समय तक मिल सकें।डॉक्टरों की कमी और भर्ती प्रक्रियाओं में होने वाली देरी को देखते हुए राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश विशेषज्ञ चिकित्सक एवं चिकित्सा शिक्षक भर्ती बोर्ड के गठन का फैसला किया है। यह बोर्ड एमडी-एमएस डिग्रीधारी विशेषज्ञ चिकित्सकों की भर्ती करेगा। साथ ही एमबीबीएस चिकित्सकों की पदोन्नति प्रक्रिया भी इसी के माध्यम से पूरी की जाएगी। सरकार को उम्मीद है कि इससे भर्ती प्रक्रिया में तेजी आएगी और रिक्त पदों को भरने में मदद मिलेगी।हालांकि विभाग के सामने सिर्फ भर्ती ही नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों को टिकाए रखना भी बड़ी चुनौती है। हर साल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 200 से 250 विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती की जाती है, लेकिन इनमें से करीब 25 फीसदी कुछ समय बाद ही कार्यस्थल छोड़ देते हैं। लंबे समय तक अनुपस्थित रहने पर विभाग नोटिस जारी करता है और वापस न लौटने पर बर्खास्तगी की कार्रवाई कर पद को पुनः रिक्त घोषित कर दिया जाता है।ग्रामीण क्षेत्रों से नौकरी छोड़ने वाले विशेषज्ञ चिकित्सकों का कहना है कि वहां आवास, बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। कई अस्पतालों में उपचार के लिए जरूरी संसाधन और उपकरण भी उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी ओर निजी अस्पताल बेहतर सुविधाओं और आकर्षक वेतन के कारण डॉक्टरों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं।चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष ने कहा कि प्रदेश में कई स्तरों पर भर्ती प्रक्रिया चल रही है। नया भर्ती बोर्ड भी बनाया जा रहा है और नए मेडिकल कॉलेजों से निकलने वाले विशेषज्ञ चिकित्सक भी सेवाओं में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले एक-दो वर्षों में अधिकांश रिक्त पद भर लिए जाएंगे और मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएगा।

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