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गढ़ा का उपेक्षित वैभव: सरकारी नजर पड़ती तो बन सकता था अंतरराष्ट्रीय पर्यटन केंद्र


सुल्तानपुर  गढ़ा किला और उससे जुड़ा प्राचीन इतिहास आज भी अपनी पहचान के पुनर्जीवन का इंतजार कर रहा है। सुल्तानपुर जिले के कुड़वार क्षेत्र में स्थित यह ऐतिहासिक स्थल, जिसे स्थानीय लोग गढ़ा के नाम से जानते हैं, कभी बौद्धकालीन सभ्यता और क्षत्रिय शासन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

इतिहासकारों के अनुसार, यहां कलाम वंश के क्षत्रियों ने कुड़वा नामक स्टेट की स्थापना की थी, जो समय के साथ कुड़वार के नाम से प्रसिद्ध हो गई। बौद्ध ग्रंथों में भी इस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है, जिससे इसकी प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।इतिहास में दर्ज तथ्यों के मुताबिक, प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग  वर्ष 636 ईस्वी में कन्नौज से प्रयाग की यात्रा पर निकला था। प्रयाग से गंगा पार कर जब वह उत्तर दिशा की ओर बढ़ा, तो उसने काशेपुला नामक एक नगर का वर्णन किया। कई इतिहासकारों का मानना है कि यह स्थान वर्तमान का गढ़ा ही हो सकता है।सुल्तानपुर गजेटियर में भी इस स्थल का उल्लेख मिलता है, जो इसकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता को और मजबूत करता है। गढ़ा के समीप बहने वाला सोतहा नामक नाला भी यहां की विशेष पहचान है। यह नाला स्वयं जलस्रोत के रूप में बहता है।जिससे आसपास के चरवाहों और पशुओं को काफी सुविधा मिलती है।हालांकि, इतनी ऐतिहासिक समृद्धि के बावजूद यह स्थल आज भी उपेक्षा का शिकार है। यहां तक पहुंचने के लिए अब भी कच्ची पगडंडी का सहारा लेना पड़ता है। कुड़वार से गढ़ा तक जाने के लिए ग्रेंट कुड़वार मार्ग से होकर गुजरना होता है।लेकिन अंतिम हिस्से में पक्की सड़क का अभाव है।यदि सरकार इस स्थल के विकास पर ध्यान दे, तो यह न केवल देश-विदेश के पर्यटन मानचित्र पर अपनी पहचान बना सकता है, बल्कि विदेशी मुद्रा अर्जित करने का भी एक बड़ा जरिया साबित हो सकता है। स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों की मांग है कि गढ़ा के संरक्षण और विकास के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। ताकि इसकी ऐतिहासिक विरासत को बचाया जा सके और आने वाली पीढ़ियां इसके गौरवशाली अतीत से परिचित हो सकें।

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