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भारत की आत्मा और संस्कृति को जोड़ने वाला सच्चा राष्ट्रवाद: अमित कुमार घोष


सुल्तानपुर  अपर मुख्य सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अमित कुमार घोष ने रविवार को श्री अरविन्द सोसाइटी द्वारा आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि प्रतिभाग किया। कार्यक्रम का विषय “सनातन धर्मः सच्चा राष्ट्रवाद – श्री अरविन्द के आलोक में” था, जिसमें राष्ट्रवाद, संस्कृति और आध्यात्मिकता के गहन संबंधों पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री घोष ने कहा कि सनातन धर्म ने भारत को हजारों वर्षों तक न केवल जीवित रखा है, बल्कि उसे सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और नैतिक रूप से समृद्ध भी किया है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रवाद का अर्थ किसी प्रकार के बहिष्कार या घृणा से नहीं है, बल्कि सच्चा राष्ट्रवाद वह है जो राष्ट्र को उसकी आत्मा से जोड़ता है और नागरिकों को केवल अधिकारों का उपभोक्ता नहीं, बल्कि कर्तव्यों का वाहक बनाता है।  उन्होंने कहा कि भारत में राष्ट्र की अवधारणा केवल भौगोलिक सीमाओं या राजनीतिक सत्ता तक सीमित नहीं रही है, बल्कि यह एक जीवंत चेतना, सांस्कृतिक एकता, नैतिक समुदाय और आध्यात्मिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। इसी कारण भारत में राष्ट्रवाद की जड़ें धर्म, दर्शन, साहित्य और लोकजीवन में गहराई से निहित हैं।    इस संदर्भ में उन्होंने बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और श्रीअरविंद के योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि “वंदे मातरम्” के माध्यम से बंकिमचंद्र ने मातृभूमि को स्वर दिया, जबकि श्रीअरविंद ने “सनातन धर्म ही राष्ट्रवाद है” के सिद्धांत के माध्यम से उसे आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान की। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म किसी एक युग, क्षेत्र या मत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक शाश्वत प्रवाह है, जो वेदों से लेकर उपनिषदों, रामायण और महाभारत से होते हुए आधुनिक राष्ट्रवाद तक निरंतर प्रवाहित होता रहा है।श्री घोष ने कहा कि “सनातन” का अर्थ ही है जो समय और सीमाओं से परे हो। जब कोई राष्ट्र अपनी इस सनातन चेतना से जुड़ता है, तभी वह वास्तविक अर्थों में राष्ट्र बनता है, अन्यथा वह केवल एक प्रशासनिक इकाई बनकर रह जाता है। उन्होंने कहा कि भारत ने अनेक आक्रमणों और चुनौतियों के बावजूद अपनी आत्मा को इसलिए सुरक्षित रखा क्योंकि उसकी मूल चेतना सनातन रही है।   उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित “वंदे मातरम्” केवल एक गीत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का महामंत्र है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जनमानस को ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान की। वहीं श्रीअरविंद ने राष्ट्रवाद को ईश्वरीय चेतना से जोड़ते हुए इसे एक उच्चतर आध्यात्मिक अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया।   उन्होंने कहा कि श्रीअरविंद द्वारा बताए गए तीन प्रमुख तत्व—पूर्ण समर्पण और त्याग, कठोर प्रशिक्षण एवं संगठित राष्ट्रभक्त कार्यकर्ता, तथा राष्ट्रधर्म—आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। यदि समाज केवल अधिकारों की बात करे और कर्तव्यों को न निभाए, तो उसका विकास अधूरा रह जाता है।  श्री घोष ने कहा कि भारतीय परंपरा में मातृभूमि को केवल भूमि नहीं, बल्कि एक दिव्य शक्ति के रूप में देखा गया है। यही दृष्टिकोण भारतीय राष्ट्रवाद को साधारण राजनीतिक राष्ट्रवाद से अलग करता है। उन्होंने 1905 के बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि “वंदे मातरम्” उस समय आंदोलन की आत्मा बन गया था और इसने जनमानस में नई चेतना का संचार किया।उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि युवा केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित रहेंगे, तो वे सक्षम राष्ट्र-निर्माता नहीं बन पाएंगे। इसके विपरीत यदि वे सेवा, अनुशासन और राष्ट्रनिष्ठा के मूल्यों को अपनाएँगे, तो वे भारत के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।  अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि सनातन धर्म सच्चा राष्ट्रवाद है, क्योंकि यह केवल देशभक्ति का नहीं, बल्कि अनुशासित, समावेशी और सेवा-आधारित जीवन दृष्टि का मार्गदर्शन करता है। उन्होंने सभी नागरिकों से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में सत्य, कर्तव्य, सेवा और त्याग को अपनाकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाएं।  कार्यक्रम में अनेक गणमान्य व्यक्तियों, विद्वानों एवं नागरिकों की उपस्थिति रही, जिन्होंने विषय पर अपने विचार साझा किए और इस प्रकार के आयोजनों को समाज के लिए अत्यंत उपयोगी बताया।

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