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केस डायरी समय पर न भेजने पर हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार पर 50 हजार का हर्जाना; लापरवाह पुलिस अधिकारियों से वसूली के निर्देश


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत याचिका की सुनवाई में देरी के लिए समय पर केस डायरी अदालत में प्रस्तुत न करने पर कड़ा रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 50 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच पूरी होने के बाद यह राशि संबंधित लापरवाह पुलिस अधिकारियों से वसूल कर याचियों को अदा की जाएगी।यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार देशवाल की एकलपीठ ने बिजनौर जिले के चांदपुर थाना क्षेत्र में दर्ज दहेज हत्या के एक मामले में आरोपी सास सबीला और ससुर यासीन की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। अदालत ने मामले में दहेज प्रताड़ना के पर्याप्त साक्ष्य न मिलने पर दोनों आरोपियों की जमानत मंजूर कर ली।सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि जमानत याचिका की प्रति संयुक्त निदेशक (अभियोजन) कार्यालय द्वारा 17 जून को पुलिस पैरोकार को उपलब्ध करा दी गई थी। इसके बाद 19 जून को पुलिस अधीक्षक को पत्र भेजा गया और 29 जून को अनुस्मारक भी जारी किया गया, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने केस डायरी अदालत में प्रस्तुत नहीं की। इस लापरवाही के कारण ग्रीष्मावकाश के दौरान दाखिल जमानत याचिका पर लंबे समय तक सुनवाई नहीं हो सकी।अदालत ने 3 जुलाई को सीसीटीएनएस पोर्टल से केस डायरी का पीडीएफ उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया था, लेकिन पुलिस की ओर से केवल आरोपियों का आपराधिक इतिहास भेजा गया। इस पर अदालत ने चांदपुर थाना प्रभारी, संबंधित उपनिरीक्षक और क्षेत्राधिकारी को व्यक्तिगत रूप से तलब किया।कोर्ट के समक्ष पेश हुए थाना प्रभारी ने छुट्टी और कांवड़ यात्रा की ड्यूटी का हवाला देते हुए देरी का कारण बताया। वहीं उपनिरीक्षक ने इसे "कम्यूनिकेशन गैप" बताया, जबकि क्षेत्राधिकारी ने कहा कि उनके साथ तैनात हेड कांस्टेबल ने अदालत से प्राप्त संदेशों की जानकारी उन्हें नहीं दी।इन अलग-अलग सफाइयों पर अदालत ने गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि पुलिस अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए एक-दूसरे पर दोष मढ़ रहे हैं। न्यायालय ने इसे गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना रवैया बताया।हाईकोर्ट ने अपने आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और बिजनौर के पुलिस अधीक्षक को भेजने के निर्देश भी दिए हैं। साथ ही सरकार को पूरे मामले की जांच कर दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने तथा हर्जाने की राशि उन्हीं से वसूलने का आदेश दिया है। अदालत की इस सख्त टिप्पणी को न्यायिक प्रक्रिया में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के लिए कड़ा संदेश माना जा रहा है।

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