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जामिया इस्लामिया में 'जलसा शुहदा-ए-इस्लाम' की नवीं महफ़िल संपन्न

रिपोर्ट-मो0 रिजवान 
जामिया इस्लामिया सुल्तानपुर में आयोजित ‘जलसा शुहदा-ए-इस्लाम’ की नवीं महफ़िल गुरुवार रात नमाज़-ए-इशा के बाद अकीदत, इल्म और रूहानियत के माहौल में संपन्न हुई। उलेमा, तलबा और अकीदतमंदों की बड़ी संख्या में मौजूदगी के बीच आयोजित इस महफ़िल में कुरआन की तिलावत, नात-ए-पाक, मनक़बत और तकरीरों के माध्यम से इस्लामी इतिहास, सहाबा-ए-किराम और शुहदा-ए-इस्लाम की कुर्बानियों को याद किया गया।

कार्यक्रम का संचालन मुजाहिद हुसैन हबीबी ने किया। महफ़िल का आगाज़ जामिया की जामा मस्जिद के मुअज्जिन हाफ़िज़ मोहम्मद शमशीर की तिलावत-ए-कुरआन से हुआ। इसके बाद उस्ताद-ए-हिफ्ज़ क़ारी मोहम्मद जमाल सीतापुरी ने नात-ए-पाक पेश कर उपस्थित जनसमूह को रूहानी कैफियत से सराबोर कर दिया। जामिया के छात्र मोहम्मद अहनफ़ ने हज़रत मुआविया (रज़ि.) की सीरत और उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रभावशाली वक्तव्य प्रस्तुत किया। वहीं जामिया के पूर्व छात्र मौलाना मोहम्मद नदीम साक़िबी ने मनक़बत पेश कर महफ़िल में अकीदत का रंग भर दिया।महफ़िल के मुख्य वक्ता मौलाना तौहीद अहमद क़ासमी (मदरसा शाही, मुरादाबाद) ने अपने विस्तृत संबोधन में हज़रत अली (कर्रम अल्लाहु वजहहू) के जीवन, वंश, फ़ज़ाइल और इस्लाम के लिए उनकी महान सेवाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने चारों ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन—हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़, हज़रत उमर फ़ारूक़, हज़रत उस्मान ग़नी और हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हुम)—के आपसी संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके बीच सम्मान, मोहब्बत, सहयोग और उम्मत की भलाई के लिए सामूहिक प्रयासों के अनेक प्रमाण इस्लामी इतिहास और हदीसों में मिलते हैं।मौलाना क़ासमी ने विभिन्न ऐतिहासिक रिवायतों और घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि इस्लामी इतिहास को समझने के लिए प्रमाणिक और विश्वसनीय स्रोतों का अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने सहाबा-ए-किराम के प्रति सम्मान और आदर बनाए रखने पर ज़ोर देते हुए कहा कि उम्मत के भीतर एकता, भाईचारा और परस्पर सम्मान का वातावरण कायम रखना समय की अहम ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि मतभेदों को उभारने के बजाय उन शिक्षाओं को अपनाना चाहिए जो समाज में सद्भाव और एकजुटता को मजबूत करती हैं। महफ़िल की अध्यक्षता जामिया इस्लामिया के नाज़िम-ए-आला मौलाना मोहम्मद उस्मान क़ासमी ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने सभी अतिथियों, उलेमा-ए-किराम, तलबा और उपस्थित जनसमुदाय का आभार व्यक्त किया तथा ‘जलसा शुहदा-ए-इस्लाम’ की दसवीं एवं अंतिम नशिस्त में अधिक से अधिक संख्या में शामिल होकर कार्यक्रम को सफल बनाने की अपील की।महफ़िल का समापन दुआ के साथ हुआ, जिसमें देश-दुनिया में अमन, भाईचारे और उम्मत-ए-मुस्लिमह की तरक्की के लिए विशेष प्रार्थना की गई। कार्यक्रम के अंत तक धार्मिक उत्साह, अनुशासन और रूहानियत का वातावरण बना रहा।

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